समस्तीपुर शहर में बगैर लाइसेंस के चल रही पानी की फैक्ट्री. Water Factory in Samastipur

Water Factory in Samastipur: समस्तीपुर जिले में इन दिनों शुद्ध पानी के नाम पर जगह जगह पानी की फैक्टी खुल चुकी है। करीब छह माह पूर्व हुए एक प्रशासनिक सर्वे में 83 पानी फैक्ट्री सिर्फ शहर व आसपास के इलाके में चलने की रिपोर्ट तैयार की गयी थी। लेकिन अब बढ़कर पानी के फैक्ट्री की संख्या 100 के पार हो चुकी है।

मुख्य शहर में ही पानी के करीब 38 प्लांट चल रहे हैं। इसमें से मात्र दो प्लांट का ही पंजीकरण था, लेकिन अब उन्होंने भी नवीनीकरण नहीं कराया है। यही नहीं पानी की गुणवत्ता की जांच के लिए भी कभी सरकारी तंत्र सक्रिय नहीं दिखाई। छापेमारी व जांच पड़ताल नहीं होने से धड़ल्ले से पानी का कारोबार जारी है। ढाई सौ मिली लीटर से लेकर बीस लीटर तक पैक्ड पानी बाजार में उपलब्ध है।

बदलते परिवेश के साथ ही मौजूदा दौर में शादी, पार्टियों में पानी की ढाई सौ एमएल की बोतलों की मांग बढ़ रही है। आधा लीटर, एक लीटर और दो लीटर पानी की बोतलों की खूब मांग है। जिले में जिस रफ्तार से बोतलबंद पानी की मांग बढ़ती जा रही है, उसी रफ्तार से पानी में भी मिलावट की मनमानी बढ़ती जा रही है। पिछले कुछ ही वर्षों में बोतल बंद पानी का कारोबार साल दर साल बढ़ रहा है और संचालकों द्वारा अच्छा टर्नओवर किया जा रहा है।

लोगों के स्वास्थ्य के साथ हो रहा खिलवाड़ : Water Factory in Samastipur 

शहर में बोतलबंद पानी का कारोबार अमानक रूप से चल रहा है। जबकि इनमें से 10 फीसदी फैक्ट्री के संचालकों ने भी लाइसेंस नहीं ले रखा है। बगैर लाइसेंस के पानी का कारोबार कर लोगों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ करने वालों पर जिम्मेदार विभाग द्वारा कोई कार्रवाई भी नहीं की जा रही है।

बता दें कि जिलेभर में सिर्फ चार लोगों के पास ही पानी का कारोबार करने का लाइसेंस है, लेकिन 100 से अधिक जगहों पर ठंडा पानी बेचने का गोरखधंधा किया जा रहा है।

आरओ प्लांट के लिए कहां से लें लाइसेंस : Water Factory in Samastipur

कंपनी के रजिस्ट्रेशन और जमीन आदि की व्यवस्था के बाद मिनरल वाटर प्लाट के लिए लाइसेंस लेना होता है। इसके लिए ब्यूरो ऑफ इंडियन स्टैंटर्ड (आईएसआई) दिल्ली को आवेदन करना होता है। आईएसआई के अधिकारी मौके पर जांच करते हैं। पानी का नमूना लेकर अनुमति पत्र देते हैं। यह पत्र जिला खाद्य विभाग के यहां देते हुए आवेदन करना होता है। औषधि प्रसाधन विभाग भौतिक जांच के बाद प्लांट का लाइसेंस देता है। इसके पहले वह मशीनों की गुणवत्ता, पानी की गुणवत्ता आदि जांचता है। पानी खारा न हो, बोरिंग कम से कम दो सौ फीट गहरी हो। वाटर लेवल ठीक हो। औषधि प्रसाधन के बाद जिला पंचायत या नगरपालिका से भी एनओसी लेना होता है। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड व श्रम विभाग में भी पंजीकरण जरूरी है।

पानी की गुणवत्ता की सही से जांच नहीं हो रही है और वह दूषित है तो ऐसे पानी से कई प्रकार की बीमारियां हो सकती है। दूषित पानी में अमीबा नामक कीटाणु होता है जो आत में जाकर पेट खराब कर देता है। इसके अलावा ई-कोलाई से लोग डायरिया का लोग शिकार हो सकते है। पीलिया व टायफाइड भी हो सकता है।

-डा. स्मिता झा, शिशु रोग विशेषज्ञ.

नगर निगम क्षेत्र में संचालित हो रहे पानी फैक्ट्री का पूरा ब्योरा तलब किया गया है। बगैर लाइसेंस के किसी भी कीमत पर इसकी बिक्री नहीं की जा सकती है। जिसके पास भी लाइसेंस नहीं होगा उसकी फैक्ट्री को बंद करते हुए आगे कार्रवाई की जाएगी।

-विभूतिरंजन चौधरी, नगर आयुक्त.

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